राज्यसभा में भाजपा का दबदबा बढ़ा: विपक्ष का कुनबा सिमटा, दो-तिहाई बहुमत के करीब पहुंची बीजेपी

संसद के उच्च सदन राज्यसभा में भाजपा का दबदबा लगातार मजबूत हो रहा है। विपक्षी खेमे के सिमटने से बीजेपी अब दो-तिहाई बहुमत के आंकड़े के बेहद करीब पहुंच गई है।
राज्यसभा में भाजपा का दबदबा
भारतीय संसद के उच्च सदन यानी राज्यसभा में भाजपा का दबदबा लगातार मजबूत होता जा रहा है। हालिया राजनीतिक बदलावों और राज्यों में मिली जीत के बाद विपक्षी दलों का खेमा लगातार कमजोर हो रहा है। अब सत्ताधारी पार्टी अपने सहयोगियों के साथ मिलकर उस जादुई आंकड़े के बेहद करीब आ गई है, जहां से बड़े फैसले लेना आसान हो जाता है।
संसद के इस सदन में सीटों की स्थिति तेजी से बदली है। विपक्ष के कई बड़े नेता अब सदन से बाहर हो चुके हैं या उनकी पार्टियों की ताकत कम हो गई है। राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि इस बदलाव से आने वाले दिनों में देश की राजनीति को एक नई दिशा मिलेगी।
संसद में बदला सीटों का गणित
राज्यसभा में कुल सीटों की संख्या 245 है। किसी भी सामान्य कानून को पास कराने के लिए बहुमत यानी आधे से अधिक सीटों की आवश्यकता होती है। भाजपा ने अपने दम पर और एनडीए (NDA – राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन) के सहयोगियों के साथ मिलकर इस आंकड़े को बहुत पहले ही पार कर लिया था।
अब स्थिति यह है कि भाजपा नीत गठबंधन 150 सीटों के आंकड़े की तरफ बढ़ रहा है। विपक्ष के पास अब इतनी संख्या भी नहीं बची है कि वह सरकार के किसी फैसले को आसानी से रोक सके। इस नए गणित ने संसद के भीतर सत्ता पक्ष को बेहद मजबूत स्थिति में खड़ा कर दिया है।
सदन के भीतर मनोनीत सदस्यों की भूमिका भी अब अहम हो गई है। राष्ट्रपति द्वारा चुने जाने वाले ये सदस्य भी अक्सर सरकार की नीतियों का समर्थन करते हैं। इस वजह से विपक्षी दलों के लिए सदन के भीतर कोई भी बड़ा विरोध प्रदर्शन करना या वोटिंग में जीतना नामुमकिन जैसा हो गया है।
राज्यसभा में भाजपा का दबदबा और उसकी ताकत
सदन के भीतर अकेले भाजपा के सदस्यों की संख्या अब 115 से ऊपर निकल चुकी है। जब इसमें सहयोगी दलों के सांसदों को जोड़ दिया जाता है, तो यह आंकड़ा दो-तिहाई बहुमत के बेहद करीब पहुंच जाता है। दो-तिहाई बहुमत यानी वह विशेष संख्या बल जो देश के संविधान में बड़ा बदलाव करने के लिए जरूरी होता है।
इस ताकत के आ जाने से सरकार को अब किसी बाहरी दल के सामने झुकने की जरूरत नहीं पड़ेगी। पहले कई मौकों पर सरकार को क्षेत्रीय दलों की शर्तों को मानना पड़ता था। लेकिन अब भाजपा अपने सहयोगियों के भरोसे ही किसी भी प्रस्ताव को आसानी से पास कराने की स्थिति में आ चुकी है।
सदन के संचालन में भी अब सत्ता पक्ष को किसी तरह की बड़ी चुनौती का सामना नहीं करना पड़ता। उपसभापति और सभापति के नियमों के तहत होने वाली कार्रवाइयों से सदन का कामकाज अब सुचारू रूप से चलता है। विपक्ष के हंगामे का असर अब वोटिंग के नतीजों पर नहीं पड़ता है।
विपक्षी दलों की चिंताएं बढ़ीं
दूसरी तरफ विपक्षी खेमे यानी इंडिया (INDIA) गठबंधन के लिए मुश्किलें कम होने का नाम नहीं ले रही हैं। मुख्य विपक्षी पार्टी कांग्रेस के पास अब राज्यसभा में केवल 30 के आसपास सीटें बची हैं। क्षेत्रीय दलों जैसे तृणमूल कांग्रेस और आम आदमी पार्टी की ताकत भी सीमित हो गई है।
विपक्ष का कुनबा सिमटने से अब सदन में बहस के दौरान उनकी आवाज कमजोर पड़ने लगी है। कई मौकों पर विपक्षी दल एकजुट होकर भी सरकार का विरोध करने में नाकाम साबित हो रहे हैं। क्षेत्रीय पार्टियों के कुछ सांसदों के पाला बदलने से भी विपक्ष को भारी नुकसान उठाना पड़ा है।
विपक्षी नेताओं को अब डर है कि सरकार उनकी सहमति के बिना भी कई कड़े कानून लागू कर सकती है। संसद की स्थायी समितियों में भी अब विपक्ष का प्रतिनिधित्व पहले के मुकाबले काफी घट गया है। इससे नीतियों की समीक्षा करने की उनकी शक्ति पर सीधा असर पड़ा है।
राज्यों के चुनाव का सीधा असर
राज्यसभा के सदस्यों का चुनाव सीधे जनता नहीं करती है। इसके लिए राज्यों की विधानसभा के सदस्य यानी विधायक (MLA) वोट डालते हैं। पिछले कुछ समय में देश के जिन राज्यों में विधानसभा चुनाव हुए हैं, वहां भाजपा को बड़ी सफलता मिली है।
मध्य प्रदेश, राजस्थान, और गुजरात जैसे बड़े राज्यों में भाजपा की मजबूत सरकारों के कारण वहां से खाली होने वाली सीटें सीधे भाजपा के खाते में जा रही हैं। वहीं उत्तर प्रदेश जैसे बड़े राज्य से भी विपक्ष के हाथ से सीटें फिसलती जा रही हैं। यही वजह है कि उच्च सदन में भाजपा की स्थिति हर महीने और मजबूत होती जा रही है।
महाराष्ट्र और बिहार जैसे राज्यों में हुए हालिया राजनीतिक गठबंधनों ने भी भाजपा के पक्ष में काम किया है। वहां के सत्ताधारी दलों के गठबंधन से राज्यसभा सीटों के चुनाव में विपक्ष को तगड़ा झटका लगा है। आने वाले समय में होने वाले अन्य राज्यों के चुनाव भी इसी ट्रेंड की तरफ इशारा कर रहे हैं।
बड़े विधेयकों को पास कराना आसान
सरकार जब भी कोई नया नियम या कानून बनाना चाहती है, तो उसे एक विधेयक यानी प्रस्ताव के रूप में संसद में लाती है। किसी भी विधेयक को कानून बनने के लिए लोकसभा और राज्यसभा दोनों सदनों से पास होना जरूरी होता है। लोकसभा में सरकार के पास पहले से ही पर्याप्त संख्या मौजूद है।
पहले राज्यसभा में संख्या कम होने के कारण कई महत्वपूर्ण कानून सालों तक अटके रहते थे। लेकिन अब बदले हुए माहौल में सरकार अपने बड़े और कड़े फैसलों से जुड़े प्रस्तावों को बिना किसी रुकावट के पास करा सकेगी। इससे विकास कार्यों और नीतिगत बदलावों को जमीन पर उतारने में तेजी आएगी।
आर्थिक सुधारों से लेकर आंतरिक सुरक्षा से जुड़े मामलों पर अब सरकार बिना किसी हिचकिचाहट के कदम बढ़ा सकती है। वन नेशन वन इलेक्शन (एक देश एक चुनाव) और समान नागरिक संहिता जैसे मुद्दों पर भी अब कानूनी रास्ता साफ होता दिखाई दे रहा है। इन बड़े फैसलों के लिए आवश्यक कानूनी ड्राफ्ट अब आसानी से मंजूर हो सकते हैं।
उच्च सदन में नया राजनीतिक समीकरण
इस नए राजनीतिक समीकरण से देश की लोकतांत्रिक व्यवस्था में एक बड़ा बदलाव देखने को मिल रहा है। जो क्षेत्रीय दल पहले संसद में अपनी शर्तों पर सरकार को नचाते थे, उनकी ताकत अब नाममात्र की रह गई है। बीजू जनता दल और वाईएसआर कांग्रेस जैसे दलों की सीटें कम होने से भी सत्ता पक्ष को फायदा मिला है।
संसद के इतिहास में यह बहुत कम मौकों पर देखा गया है जब किसी एक दल का प्रभाव दोनों सदनों में इतना व्यापक हो गया हो। यह स्थिति आगामी आम चुनावों तक भाजपा को एक मनोवैज्ञानिक बढ़त भी प्रदान करती है। विपक्षी खेमे को अब अपनी रणनीतियों पर नए सिरे से विचार करना होगा।
राजनीतिक विश्लेषकों का कहना है कि यह दबदबा आने वाले कई सालों तक बरकरार रह सकता है। राज्यसभा एक स्थायी सदन है जो कभी पूरी तरह भंग नहीं होता, बल्कि इसके एक-तिहाई सदस्य हर दो साल में रिटायर होते हैं। इसलिए इस सदन में अपनी पकड़ मजबूत बनाए रखना किसी भी सरकार के लिए सबसे बड़ी राजनीतिक जीत मानी जाती है।


