बिहार में सेब की खेती: सीवान के किसान ने उगाए कश्मीरी सेब

बिहार में सेब की खेती का सफल प्रयोग हुआ है। सीवान के एक किसान ने गर्म मौसम के अनुकूल कश्मीरी सेब उगाकर सबको चौंका दिया है। जानें पूरी कहानी।
सीवान के किसान ने उगाए कश्मीरी सेब
बिहार के सीवान जिले से एक बेहद हैरान करने वाली और अच्छी खबर सामने आई है। यहाँ एक प्रगतिशील किसान ने पारंपरिक खेती से हटकर बिहार में सेब की खेती को हकीकत में बदल दिया है। उन्होंने अपने खेत में कश्मीर जैसे रसीले और लाल सेब पैदा करके कृषि वैज्ञानिकों को भी हैरत में डाल दिया है।
सीवान के किसान ने किया नया प्रयोग
यह कमाल सीवान जिले के महाराजगंज प्रखंड के रहने वाले किसान रामेश्वर सिंह ने कर दिखाया है। रामेश्वर हमेशा से कुछ नया करने की चाह रखते थे। उन्होंने पारंपरिक फसलों जैसे गेहूं और धान के बजाय कुछ अलग करने का फैसला लिया।
उन्होंने दो साल पहले अपने एक छोटे से भूखंड पर सेब के पौधे लगाने की योजना बनाई थी। शुरुआत में गाँव के लोग उनकी इस योजना पर हंसते थे। लोगों का मानना था कि बिहार की गर्म मिट्टी में सेब की पैदावार कभी मुमकिन नहीं है।
गर्म मौसम वाली खास प्रजाति का चयन
रामेश्वर सिंह ने हारिमन-99 नाम की सेब की एक विशेष किस्म के पौधे मँगवाए। यह प्रजाति मैदानी और गर्म इलाकों में भी फल देने की क्षमता रखती है। इस पौधे की सबसे बड़ी खासियत यह है कि यह 40 से 45 डिग्री तापमान को भी आसानी से बर्दाश्त कर लेता है।
आमतौर पर पारंपरिक कश्मीरी सेब को बहुत ठंडे मौसम और बर्फबारी की जरूरत होती है। लेकिन वैज्ञानिकों द्वारा तैयार की गई इस नई किस्म ने बिहार के किसानों के लिए नए रास्ते खोल दिए हैं। रामेश्वर ने तकनीक का सही इस्तेमाल कर इन पौधों की देखभाल की।
पौधों से मिलने लगा भरपूर फल
दो साल की कड़ी मेहनत के बाद अब रामेश्वर के बाग में लगे पेड़ों पर लाल-लाल सेब लटकने लगे हैं। इन सेबों का आकार और रंग बिल्कुल वैसा ही है जैसा कश्मीर या हिमाचल के बागानों में देखने को मिलता है। सेब की अच्छी फसल देखकर रामेश्वर का पूरा परिवार बेहद खुश है।
इस समय उनके बागान में करीब पचास पेड़ पूरी तरह से फलों से लदे हुए हैं। एक-एक पेड़ पर बीस से तीस किलो तक सेब आए हैं। स्थानीय लोग इस अनोखे बाग को देखने के लिए दूर-दूर से रामेश्वर के घर पहुंच रहे हैं।
जैविक खाद और सिंचाई का सही तरीका
रामेश्वर सिंह ने बताया कि उन्होंने इस खेती में किसी भी तरह के रासायनिक कीटनाशकों का उपयोग नहीं किया है। उन्होंने पूरी तरह से जैविक यानी प्राकृतिक खाद जैसे गोबर की खाद और केंचुए से बनी खाद का इस्तेमाल किया। इससे फलों का स्वाद बेहद मीठा और प्राकृतिक बना हुआ है।
गर्मियों के दिनों में पौधों को बचाने के लिए उन्होंने सिंचाई की आधुनिक ड्रिप इरीगेशन यानी बूंद-बूंद सिंचाई पद्धति को अपनाया। इस तकनीक से पौधों की जड़ों को लगातार नमी मिलती रही और पानी की बर्बादी भी नहीं हुई। इसी वजह से तेज धूप में भी पौधे सुरक्षित रहे।
किसानों के लिए आमदनी का नया जरिया
बिहार में आम और लीची की खेती तो बड़े पैमाने पर होती है, लेकिन सेब का उत्पादन एक नई क्रांति की तरह है। कृषि विभाग के अधिकारी भी रामेश्वर के इस प्रयास की सराहना कर रहे हैं। अधिकारियों का मानना है कि इससे राज्य के अन्य किसानों की आमदनी बढ़ाने में बड़ी मदद मिलेगी।
पारंपरिक खेती में लागत अधिक आती है और मुनाफा सीमित होता है। इसके विपरीत फलदार पौधों की खेती से किसान भाई कम जमीन में भी कई गुना अधिक मुनाफा कमा सकते हैं। सीवान का यह प्रयोग पूरे बिहार के लिए एक मिसाल बन चुका है।
कृषि वैज्ञानिकों ने दी अहम सलाह
स्थानीय कृषि विज्ञान केंद्र के वैज्ञानिकों ने रामेश्वर के इस बाग का दौरा किया है। वैज्ञानिकों के अनुसार मिट्टी की जांच और सही पोषण मिलने से फलों की गुणवत्ता बहुत अच्छी हुई है। उन्होंने अन्य किसानों को भी इस तकनीक को समझने की सलाह दी है।
वैज्ञानिकों ने कहा कि शुरुआत में छोटे स्तर पर ही परीक्षण करना चाहिए। मिट्टी और पानी की उपलब्धता को देखकर ही पौधों की संख्या बढ़ानी चाहिए। रामेश्वर सिंह अब अपने आसपास के युवाओं को भी इस आधुनिक खेती की ट्रेनिंग यानी प्रशिक्षण देने की तैयारी कर रहे हैं।
बाजार में मिल रही अच्छी कीमत
रामेश्वर के बाग के सेब अब स्थानीय बाजारों में भी पहुंचने लगे हैं। कश्मीरी सेब के मुकाबले स्थानीय स्तर पर ताजा टूटे हुए सेबों को लोग हाथों-हाथ खरीद रहे हैं। ग्राहकों का कहना है कि इन सेबों का स्वाद बहुत मीठा और कुरकुरा है।
बाजार में अच्छी कीमत मिलने से रामेश्वर की आर्थिक स्थिति में बड़ा सुधार होने की उम्मीद है। वे आने वाले समय में अपने इस बागान का दायरा और बढ़ाने वाले हैं। वे बिहार के अन्य जिलों में भी इस पौधे की सप्लाई यानी आपूर्ति करने की योजना बना रहे हैं।


